NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 1 सुभाषितानि

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NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Ruchira Chapter 1 सुभाषितानि

अभ्यास के प्ररनौं के उत्तर

प्रश्न: 1.
सर्वान् श्लोकान् सस्वरं गायत।(सभी श्लोकों को स्वर से गाएँ)
उत्तर
छात्राः स्वयं गायन्तु।

प्रश्न: 2.
यथायोग्यं श्लोकांशान् मेलयत
(क) – (ख)
धनधान्यप्रयोगेषु – नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्।
विस्मयो न हि कर्तव्यः – त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
सत्येन धार्यते पृथ्वी – बहुरत्ना वसुन्धरा।
सद्भिर्विवादं मैत्री च – विद्यायाः संग्रहेषु च।
आहारे व्यवहारे च – सत्येन तपते रविः।
उत्तर
(क) – (ख)
धनधान्यप्रयोगेषु – नासद्भिः किञ्चिदाचरेत।
विस्मयो न हि कर्तव्यः – त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
सत्येन धार्यते पृथ्वी – बहुरत्ला वसुन्धरा।
सद्भिर्विवादं मैत्री – विद्यायाः संग्रहेषु च।
आहारे व्यवहारे च – सत्येन तपते रविः ।

प्रश्न: 3.
एकपदेन उत्तरत
(क) पृथिव्यां कति रत्नानि ?
उत्तर
त्रीणि।

(ख) मूढैः कुत्र रत्नसंज्ञा विधीयते ?
उत्तर
पाषाणखण्डेषु।

(ग) पृथिवी केन धार्यते ?
उत्तर
सत्येन।

(घ) कैः सङ्गतिं कुर्वीत ?
उत्तर
सद्भिः

(ङ) लोके वशीकृतिः का ?
उत्तर
क्षमा।

प्रश्न: 4.
रेखाङ्कितपदानि अधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) सत्येन वाति वायुः।
(ख) सद्भिः एव सहासीत।
(ग) वसुन्धरा बहुरला भवति।
(घ) विद्यायाः संग्रहेषु त्यक्तलजः सुखी भवेत्।
(ङ) सद्भिः मैत्रीं कुर्वीत।
उत्तर
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) केन वाति वायुः ?
(ख) कैः एव सहासीत ?
(ग) का बहुरत्ना भवति ?
(घ) कस्याः संग्रहेषु त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ?
(ङ) कैः सह मैत्री कुर्वीत ?

प्रश्न: 5.
प्रश्नानामुत्तराणि लिखत

(क) कुत्र विस्मयः न कर्तव्यः ?
उत्तर
दाने, तपसि, शौर्ये, विज्ञाने, विनये, नये च विस्मयः न कर्तव्यः।

(ख) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि ?
उत्तर
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलम्, अन्नं सुभाषितं च सन्ति।

(ग) त्यक्तलजः कुत्र सुखी भवेत् ?
उत्तर
धनधान्य-प्रयोगेषु, विद्यायाः संग्रहेषु, आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

प्रश्नः 6.
मञ्जूषातः पदानि चित्वा लिङ्गानुसारं लिखत
रत्नानि, वसुन्धरा, सत्येन, सुखी, अन्नम्, वह्निः, रविः, पृथ्वी, सङ्गतिम्।
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 1 सुभाषितानि 1
उत्तर
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 1 सुभाषितानि 2

प्रश्न: 7
अधोलिखितपदेषु धातवः के सन्ति ?
पदम् – धातुः
कर्तव्यः …………..
पश्य …………..
भवेत् …………..
स्थितः …………..
उत्तर
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 1 सुभाषितानि 3

बहुविकल्पी प्रश्न

(i) पृथिव्यां कति रत्नानि ?
(A) द्वे
(B) त्रीणि
(C) चत्वारि
(D) पञ्च।
उत्तर
(B) त्रीणि

(ii) मूढः कुत्र रत्नसंज्ञा विधीयते ?
(A) खण्डेषु
(B) रत्नेषु
(C) पाषाणेषु.
(D) पाषाणखण्डेषु ।
उत्तर
(D) पाषाणखण्डेषु ।

(iii) पृथिवी केन धार्यते ?
(A) असत्येन
(B) सत्येन
(C) बलेन
(D) संकल्पेन।
उत्तर
(B) सत्येन

(iv) कैः सङ्गतिं कुर्वीत ?
(A) सद्भिः
(B) असद्भिः
(C) कुजनैः
(D) दुर्जनैः
उत्तर
(A) सद्भिः

(v) लोके वशीकृतिः का?
(A) रमा
(B) मक्षिका
(C) क्षमा
(D) मक्षिका।
उत्तर
(C) क्षमा

(vi) केन वाति वायुः ?
(A) सत्येन
(B) बलेन
(C) संकल्पेन
(D) असत्येन।
उत्तर
(A) सत्येन

(vii) कैः एव सहासीत ?
(A) कुजनैः
(B) सद्भिः
(C) दुर्जनैः
(D) कदापि।
उत्तर
(B) सद्भिः

(viii) का बहुरत्ला भवति ?
(A) वसुन्धरा
(B) लक्ष्मी
(C) सरस्वती
(D) दुर्गा ।
उत्तर
(A) वसुन्धरा

(ix) कस्याः संग्रहेषु त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ?
(A) कुविद्यायाः
(B) अविद्यायाः
(C) विद्यायाः
(D) सद्यायाः।
उत्तर
(C) विद्यायाः

(x) कैः सह मैत्री कुर्वीत ?
(A) दुर्जनः
(B) कुजनैः
(C) खलैः
(D) सद्भिः
उत्तर
(D) सद्भिः

Class 7 Sanskrit Chapter 1 सुभाषितानि Summary Translation in Hindi

श्लोकों का हिन्दी में सरलार्थ

1. पृथिव्यां त्रीणि रत्लानि जलमन्नं सुभाषितम्
मूढः पाषाणखण्डेषु रलसंज्ञा विधीयते॥ 1 ॥

शब्दार्थाः
पृथिव्याम् = धरती पर।
सुभाषितम् = सुन्दर वचन।
मूढः = मूर्यों के द्वारा।
पाषाणखण्डेषु = पत्थर के टुकड़ों में।
रत्नसंज्ञा = रत्ल का नाम।
विधीयते = किया जाता

सरलार्थ:-धरती पर तीन ही रत्न हैं-
1. जल
2. अन्न तथा
3 कवियों के सुन्दर वचन। मूखों के द्वारा ही पत्थर के टुकड़ों में रत्न का नाम किया जाता है।

भावार्थ:-श्लोक का भाव है कि पृथ्वी पर वास्तविक रत्न तो जल, अन्न तथा कवियों के सुन्दर वचन ही है, जलऔर अन्न से मनुष्यों का जीवन चलता है तथा कवियों के सुभाषित से जीवन सुन्दर बनता है। हीरे, मोती आदि तो पत्थर के टुकड़े हैं। इनसे किसी का जीवन सुन्दर नहीं बनता। अतः इन पत्थर के टुकड़ों को जो लोग रत्न का नाम देते हैं, वे तो मूर्ख ही हैं।

2.सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम्॥ 2 ॥

शब्दार्थाः
धार्यते = धारण किया जाता है।
पृथ्वी = धरती।
तपते = जलता है, प्रकाशित होता है।
रविः = सूर्य ।
वाति = बहता है/बहती है।
वायुश्च (वायुः + च) = वायु भी।
सर्वम् = सब कुछ।
प्रतिष्ठितम् = स्थित है।

सरलार्थ:-सत्य के द्वारा धरती को धारण किया जाता है। सत्य के बल से ही सूर्य प्रकाशित होता है। वायु भी सत्य से ही बहती है। इस प्रकार सब कुछ सत्य पर ही स्थित है।

भावार्थ:- इस श्लोक में सत्य का महत्व बताया गया है। सत्य के बल पर कठिन से कठिन कार्य किए जा सकते हैं। यह पृथ्वी सत्य के बल पर ही सारे प्राणियों तथा जड़ पदार्थों को धारण कर रही है। सूर्य सत्य के बल पर ही निरन्तर जलता रहता है। वायु भी सत्य के बल पर निरन्तर बहती रहती है। इस प्रकार सारा ब्रह्माण्ड सत्य पर ही टिका हुआ है। अत: सत्य को जीवन में अवश्य ही अपनाना चाहिए।

3.दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये।
विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ॥ 3॥

शब्दार्था:
दाने = दान में।
तपसि = तप में।
शायें = बल में।
विज्ञाने = विज्ञान में, विशेष ज्ञान में।
विनय = विनम्रता में।
नये = नीति में।
विस्मयो न (विस्मयः + न) = आश्चर्य नहीं, अहंकार नहीं।
कर्तव्यः = करना चाहिए।
बहुरना = बहुतरत्नों वाली।
वसुन्धरा = धरती।

सरलार्थ:-दान, तप, बल, विशेष ज्ञान, विनयशीलता, तथा नीति में (किसी को बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा देखकर)
आश्चर्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह धरती बहुत रत्नों वाली है।

भावार्थ:-इस धरती पर एक-से बढ़कर एक दानी, तपस्वी, बलवान, ज्ञानी, विनयशील तथा नीतिवान् लोग मिल जाते हैं। इनको देखकर साधारण मनुष्य को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि यह धरती अनेक प्रकार के रत्नों से भरी पड़ी है। दानी, तपस्वी आदि को भी रत्न ही समझना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति स्वयं ही दानी, तपस्वी, बलवान्, जानी, विनम्र अथवा नीतिमान् है तो उसे अपने इन गुणों पर कोई अहंकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि धरती पर और भी बहुत से दानवीर, तपस्वी आदि विद्यमान हैं।

4. सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्।
सद्भिर्विवादं मैत्री च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत् ॥ 4 ॥

शब्दार्थाः-
सद्भिरेव (सद्भिः + एव) = सज्जनों के साथ ही।
सहासीत (सह + आसीत) = साथ बैठना चाहिए।
कुर्वीत = करना चाहिए।
सङ्गतिम् = संगति को।
सद्भिर्विवादम् (सद्भिः + विवादम्) = सज्जनों के साथ झगडा/विवाद।
मैत्रीम् = मित्रता को।
नासद्भिः (न + असद्भिः) = असज्जनों के साथ नहीं, दुष्टों के साथ नहीं।
किञ्चित् = कुछ भी, किसी भी प्रकार का।
आचरेत् = आचरण/व्यवहार करना चाहिए।

सरलार्थ:- सदा सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए, सज्जनों की संगति करनी चाहिए, सज्जनों के साथ ही झगड़ा करना चाहिए, सज्जनों के साथ ही मित्रता करनी चाहिए। असज्जनों के साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार नहीं करना चाहिए।

भावार्थ:- एक अच्छा आदर्श व्यक्ति बनने के लिए यह आवश्यक है कि वह सदा सज्जनों के साथ ही अपना हर तरह का व्यवहार करे। उठना-बैठना, खाना-पीना, हँसना-बोलना, खेलना-झगड़ना, दोस्ती-दुश्मनी सभी प्रकार की संगति सज्जनों

के साथ ही करनी चाहिए। दुष्टों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं करना चाहिए, उनकी संगति से सदा दूर ही रहना चाहिए।

6.धनधान्यप्रयोगेषु विद्यायाः संग्रहेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलग्जः सुखी भवेत्॥5॥

शब्दार्था:-
धनधान्य-प्रयोगेषु = धनधान्य के प्रयोग में। व्यवहार में।
विद्यायाः = विद्या के, ज्ञान के।
संग्रहेषु = संग्रहों में, अर्जन करने में, संचय करने में, इकट्ठा करने में।
आहारे व्यवहारे = आहार-व्यवहार में।
त्यक्तलजः = संकोच/भीरुता को छोड़नेवाला।

सरलार्थ:- धनधान्य के प्रयोग में, विद्या के अर्जन करने में तथा आहार-व्यवहार करने में संकोच को छोड़नेवाला सुखी रहता है।

भावार्थ:- जो मनुष्य धन-सम्पत्ति के लेन-देन में कभी संकोच नहीं करता, ज्ञान अर्जित करने में सदा उत्साहित रहता है तथा खाने-पीने एवं दुसरे प्रकार के सामाजिक कार्यों में डर-भय छोड़कर व्यवहार करता है, वह सदा सुखी रहता है। जो मनुष्य ऐसा व्यवहार नहीं करते उन्हें बाद में पछताना पड़ता है।

7. क्षमावशीकृतिलोंके क्षमया किं न साध्यते।
शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः ॥ 6 ॥

शब्दार्था:-
क्षमावशीकृतिलोंके (क्षमावशीकृतिः + लोके) = संसार में क्षमा (सबसे बड़ा) वशीकरण है।
क्षमया = क्षमा द्वारा।
किं न साध्यते = क्या सिद्ध नहीं किया जाता।
शान्तिखड्गः = शान्ति रूपी तलवार करे – हाथ में।
यस्य = जिसके।
किं करिष्यति = क्या करेगा/क्या बिगाड़ेगा।
दुर्जनः = दुर्जन, दुष्ट मनुष्य।

सरलार्थ:- संसार में क्षमा ही सबसे बड़ा वशीकरण अर्थात् दुसरों को अपने वश में करने का साधन है। क्षमा द्वारा संसार में कौन-सा कार्य सिद्ध नहीं किया जा सकता ? अर्थात् सभी कार्य क्षमा से सफल हो जाते हैं। जिस मनुष्य के हाथ में शान्ति की तलवार हो, दुर्जन उसका क्या बिगाड़ेगा ? अर्थात् दुर्जन उसका | कुछ भी अनर्थ नहीं कर सकता।

भावार्थ:- इस श्लोक में क्षमा के महत्व को समझाया गया है। संसार में यदि हम दूसरों को अपना बनाना चाहते हैं-उन्हें अपने वश में करना चाहते हैं तो क्षमा से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं, क्योंकि क्षमा ही सबसे बड़ा वशीकरण है। शान्त स्वभाव, क्षमाशील मनुष्य का दुर्जन भी कुछ अपकार नहीं कर सकता।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः

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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
उच्चारणं कुरुत-
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q1
उत्तरम्:
शिक्षकसहायतया स्वयमेव कुर्युः।

प्रश्न 2.
प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?
उत्तरम्:
अष्टाविंशतिः।

(ख) प्राचीनेतिहासे काः स्वाधीनाः आसन्?
उत्तरम्:
सप्तभगिन्यः।

(ग) केषां समवायः ‘सप्तभगिन्यः’ इति कथ्यते?
उत्तरम्:
सप्तराज्यानाम्।

(घ) अस्माकं देशे कति केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति?
उत्तरम्:
सप्त।

(ङ) सप्तभगिनी-प्रदेशे क: उद्योगः सर्वप्रमुख:?
उत्तरम्:
वंशोद्योगः।

प्रश्न 3.
अधोलिखितपदेषु प्रकृति-प्रत्ययविभागं कुरुत-
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q3
उत्तरम्:
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q3.1

प्रश्न 4.
पाठात् चित्वा तद्भवपदानां कृते संस्कृतपदानि लिखत-
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q4
उत्तरम्:
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q4.1
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q4.2

प्रश्न 5.
भिन्न प्रकृतिकं पदं चिनुत-
(क) गच्छति, पठति, धावति, अहसत्, क्रीडति।
उत्तरम्:
अहसत्।

(ख) छात्रः, सेवकः, शिक्षक:, लेखिका, क्रीडकः।
उत्तरम्:
लेखिका।

(ग) पत्रम्, मित्रम्, पुष्पम्, आम्रः, नक्षत्रम्।
उत्तरम्:
आनः।

(घ) व्याघ्रः, भल्लूकः, गजः, कपोतः, वृषभः, सिंहः।
उत्तरम्:
कपोतः।

(ङ) पृथिवी, वसुन्धरा, धरित्री, यानम्, वसुधा।
उत्तरम्:
यानम्।

प्रश्न 6.
मञ्जूषातः क्रियापदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q6
(क) अयं प्रयोगः प्रतीकात्मक: ___________|
(ख) सप्त केन्द्रशासितप्रदेशा: ___________|
(ग) अत्र बहवः जनजातीयाः ___________|
(घ) अहं किमपि श्रोतुम् ___________|
(ङ) तत्र हस्तशिल्पिनां बाहुल्यं ___________|
(छ) गुणगौरवदृष्ट्या इमानि बृहत्तराणि ___________|
उत्तरम्:
(क) अयं प्रयोगः प्रतीकात्मक: वर्तते।
(ख) सप्त केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति।
(ग) अत्र बहवः जनजातीयाः निवसन्ति।
(घ) अहं किमपि श्रोतुम् इच्छामि।
(ङ) तत्र हस्तशिल्पिना बाहुल्यम् अस्ति।
(च) सप्तभगिनीप्रदेशाः रम्याः हृद्याः च वर्तन्ते।
(छ) गुणगौरवदृष्ट्या इमानि बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।

प्रश्न 7.
विशेष्य-विशेषणानाम् उचितं मेलनम् कुरुत-
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q7
उत्तरम्:
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Q7.1

योग्यता-विस्तारः
अद्वयं मत्रयं चैव न-त्रि-युक्तं तथा द्वयम्।
सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मतम्॥

यह राज्यों के नामों को याद रखने का एक सरल तरीका है। इसका अर्थ है अ से आरम्भ होने वाले दो, म से आरम्भ होने वाले तीन, न से नगालैण्ड और त्रि से त्रिपुरा का बोध होता है। इसी प्रकार अठारह पुराणों के नाम याद रखने के लिये यह श्लोक प्रसिद्ध है-

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।
अ-ना-प-लिंग-कूस्कानि पुराणानि प्रचक्षते॥

‘सप्तभगिनी’ इस उपनाम का सर्वप्रथम प्रयोग 1972 में श्री ज्योति प्रसाद सैकिया ने आकाशवाणी के साथ भेंटवार्ता के क्रम में किया था।
इनके अन्तर्गत आने वाले राज्यों का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी प्राप्त होता है।
यथा-महाभारत, रामायण, पुराण आदि।
इन राज्यों की राजधानी क्रमशः इस प्रकार हैं-

अरुणाचल प्रदेश – इटानगर
असम – दिसपुर
मणिपुर – इम्फाल
मिजोरम – ऐजोल
मेघालय – शिलाङ्ग
नगालैण्ड – कोहिमा
त्रिपुरा – अगरतला

बिहू, मणिपुरी, नानक्रम आदि इस प्रदेश के प्रमुख नृत्य है।

नगा, मिजो, खासी, असमी, बांग्ला, पदम, बोडो, गारो, जयन्तिया आदि यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हैं।

सप्तसंख्या पर कुछ-अन्य प्रचलित नाम हैं-
सप्तसिन्धु – ‘सप्तभगिनी’ के समान सप्तसिन्धु भी हैं। ये सप्तसिन्धु हैं-सिन्धु, शुतुद्री (सतलुज), इरावती (इरावदी), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), असिक्नी (चिनाब) और सरस्वती।

सप्तपर्वत – महेन्द्र, मलय, हिमवान्, अर्बुद, विन्ध्य, सह्याद्रि, श्रीशैल।

सप्तर्षि – मरीचि, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, अत्रि, पुलह, वसिष्ठ।

कृष्णनाथ की पुस्तक अरुणाचल यात्रा (वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर 2002) पठनीय है।

परियोजना-कार्यम्
पाठ में स्थित अद्वयं ….. वाली पहेली से सातों राज्यों के नाम को समझो।

Class 8 Sanskrit Chapter 9 सप्तभगिन्यः Summary

पाठ-परिचयः
भारतवर्ष अपनी भौगोलिक विशेषताओं का एक अनोखा संगम है। ‘सप्तभगिनी’ यह एक उपनाम है। उत्तर-पूर्व के सात राज्य विशेष को उक्त उपाधि दी गयी है। इन राज्यों का प्राकृतिक सौन्दर्य अत्यन्त विलक्षण है। इन्हीं के सांस्कृतिक और सामाजिक वैशिष्ट्य को ध्यान में रखकर प्रस्तुत पाठ का सृजन किया गया है।

प्रत्यय:

मूलपाठः
अध्यापिका – सुप्रभातम्।

छात्राः – सुप्रभातम्। सुप्रभातम्।

अध्यापिका – भवतु। अद्य किं पठनीयम्?

छात्राः – वयं सर्वे स्वदेशस्य राज्यानां विषये ज्ञातुमिच्छामः।

अध्यापिका – शोभनम्। वदत। अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?

सायरा – चतुर्विंशतिः महोदये!

सिल्वी – न हि न हि महाभागे! पञ्चविंशतिः राज्यानि सन्ति।

अध्यापिका – अन्यः कोऽपि….?

स्वरा – (मध्ये एव) महोदये! मे भगिनी कथयति यदस्माकं देशे अष्टाविंशतिः राज्यानि सन्ति। एतद तिरिच्य सप्त केन्द्रशासितप्रदेशाः अपि सन्ति।

अध्यापिका – सम्यग्जानाति ते भगिनी। भवतु, अपि जानीथ यूयं यदेतेषु राज्येषु सप्तराज्यानाम् एकः समवायोऽस्ति यः सप्तभगिन्यः इति नाम्ना प्रथितोऽस्ति।

सर्वे – (साश्चर्यम् परस्परं पश्यन्तः) सप्तभगिन्यः? सप्तभगिन्यः?

निकोलसः – इमानि राज्यानि सप्तभगिन्यः इति किमर्थ कथ्यन्ते?

अध्यापिका – प्रयोगोऽयं प्रतीकात्मको वर्तते। कदाचित् सामाजिक-सांस्कृतिक-परिदृश्यानां साम्या इमानि उक्तोपाधिना प्रथितानि।

समीक्षा – कौतूहलं मे न खलु शान्तिं गच्छति, श्रावयतु तावद् यत् कानि तानि राज्यानि?

अध्यापिका – शृणुत! अद्वयं मत्रयं चैव न-त्रि-युक्तं तथा द्वयम्। सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मनम्।। इत्थं भगिनी सप्तके इमानि राज्यानि सन्ति-अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरम्, मिजोरमः, मेघालयः, नगालैण्डः, त्रिपुरा चेति। यद्यपि क्षेत्रपरिमाणैः इमानि लघूनि वर्तन्ते तथापि गुणगौरवदृष्ट्या बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।

सवें – कथम्? कथम्?

अध्यापिका – इमाः सप्तभगिन्यः स्वीये प्राचीनेतिहासे प्राय: स्वाधीनाः एव दृष्टाः। न केनापि शासवेन इमाः स्वायत्तीकृताः। अनेक-संस्कृति-विशिष्टायां भारतभूमौ एतासां भगिनीनां संस्कृतिः महत्त्वाधायिनी इति।

तन्वी – अयं शब्दः सर्वप्रथम कदा प्रयुक्तः?

अध्यापिका – श्रुतमधु रशब्दोऽयं सर्वप्रथम विगतशताब्दस्य द्विसप्ततितमे वर्षे त्रिपुराराज्यस्योद्घाटनक्रमे वेनापि प्रवर्तितः। अस्मिन्नेव काले एतेषां राज्यानां पुनः सङ्घटनं विहितम्।

स्वरा – अन्यत् किमपि वैशिष्ट्यमस्ति एतेषाम्?

अध्यापिका – नूनम् अस्ति एव। पर्वत-वक्ष-पुष्प- प्रतिभिः प्राकृतिकसम्पद्धिः सुसमृद्धानि सन्ति इमानि राज्यानि। भारतवृक्षे च पुष्प-स्तबकसदृशानि विराजन्ते एतानि।

राजीवः – भवति! गृहे यथा सर्वाधिका रम्या मनोरमा च भगिनी भवति तथैव भारतगृहेऽपि सर्वाधिकाः रम्याः इमा: सप्तभगिन्यः सन्ति।

अध्यापिका – मनस्यागता ते इयं भावना परमकल्याणमयी परं सर्वे न तथा अवगच्छन्ति। अस्तु, अस्ति तावदेतेषां विषये किञ्चिद् वैशिष्ट्यमपि कथनीयम्। सावहितमनसा शृणुतजनजाति बह ल प दे शो ऽयम्। गारो-खासी-नगा-मिजो-प्रभृतयः बहवः जनजातीयाः अत्र निवसन्ति। शरीरेण ऊर्जस्विनः एतत्प्रादेशिकाः बहुभाषाभिः समन्विताः, पर्वपरम्पराभिः परिपूरिताः, स्वलीला- कलाभिश्च निष्णाताः सन्ति।

मालती – महोदये! तत्र तु वंशवृक्षा अपि प्राप्यन्ते?

अध्यापिका – आम्। प्रदेशेऽस्मिन् हस्तशिल्पानां बाहुल्यं वर्तते। अन्न वस्त्राभूषणेभ्य: गृहनिर्माणपर्यन्तं प्रायः वंशवृक्षनिर्मितानां वस्तूनाम् उपयोग: क्रियते। यतो हि अत्र वंशवृक्षाणां प्राचुर्य विद्यते। साम्प्रतं वंशो द्योगोऽयं अन्ताराष्ट्रियख्यातिम् अवाप्तोऽस्ति।

अभिनवः – भगिनीप्रदेशोऽयं बह्वाकर्षकः ज्ञायते।

सलीमः – किं भ्रमणाय भगिनीप्रदेशोऽयं समीचीनः?

सर्वे छात्राः – (उच्चैः) महोदये! आगामिनि अवकाशे वयं तत्रैव गन्तुमिच्छामः।

स्वरा – भवत्यपि अस्माभिः सार्द्ध चलतु।

अध्यापिका – रोचते मेऽयं विचारः। एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थं स्वर्गसदृशानि इति।

सन्धिविच्छेदः
चतुर्विंशतिः = चतुः + विंशतिः।
महोदये = महा + उदये।
कोऽपि = कः + अपि।
यदस्माकम् = यत् + अस्माकम्।
एतदतिरिच्य = एतत् + अतिरिच्य।
सम्यग्जानाति = सम्यक् + जानाति।
यदेतेषु = यत् + एतेषु।
समवायोऽस्ति = समवायः + अस्ति।
प्रथितोऽस्ति = प्रथितः + अस्ति।
साश्चर्यम् = साश + आपचर्यम्।
प्रयोगोऽयम् = प्रयोगः + अयम्।
प्रतीकात्मकोवर्तते = प्रतीक + आत्मकः + वर्तते।
साम्या इमानि = साम्यात् + इमानि।
उक्तोपाधिना = उक्त + उपाधिना।
तावद् यत् = तावत् + यत्।
समूहोऽयम् = समूह: + अयम्।
चेति = च + इति।
यद्यपि = यदि + अपि।
तथापि = तथा + अपि।
प्राचीनेतिहासे = प्राचीन + इतिहासे।
स्वाधीना = स्व + अधीना:।
केनापि = केन + अपि।
स्वायत्तीकृताः = स्व + आयन्तीकृताः।
महत्त्वाधायिनी = महत्त्व + आधायिनी।
शब्दोऽयम् = शब्दः + अयम्।
राज्यस्योद्घाटनक्रमे = राज्यस्य + उत् + घाटनक्रमे।
अस्मिन्नेव = अस्मिन् + एव।
सङ्घटनम् = सम् + घटनम्।
तथैव = तथा + एव।
भारतगृहेऽपि = भारतगृहे + अपि।
मनस्यागता = मनसि + आगता।
तावदेतेषाम् = ताव् + एतेषाम्।
किञ्चित् = किम् + चित्।
प्रदेशोऽयम् = प्रदेशेः + अयम्।
कलाभिश्च = कलाभिः + च।
वंशवृक्षा अपि = वंशवृक्षाः + अपि।
प्रदेशेऽस्मिन् = प्रदेशे + अस्मिन्।
वस्त्राभूषणेभ्यः = वस्त्र + आभूषणेभ्यः।
यतो हि = यतः + हि।
वंशोद्यागोऽयम् = वंश + उद्योग + अयम्।
अवाप्तोऽस्ति = अव + आप्तः + अस्ति।
बह्वाकर्षकः = बहु + आकर्षक:।
भवत्यपि = भवती + अपि।
मेऽयम् = मे + अयम्।
भ्रमणार्थम् = भ्रमण + अर्थम।

संयोगः
ज्ञातुमिच्छामः = ज्ञातुम् + इच्छामः।
किमर्थम् = किम् + अर्थम्।
किमपि = किम् + अपि।
वैशिष्ट्यमस्ति = वैशिष्ट्यम् + अस्ति।
गन्तुमिच्छामः = गन्तुम् + इच्छामः।

पदार्थबोध:
बाढम् = हाँ, अच्छा, ठीक है (अस्तु, शोभनम्)।
ज्ञानुम् = जानने हेतु (अवगन्तुम्)।
कति = कितने (किंपरियाणं, किंमात्रम्)।
भगिनी = बहन (स्वस)।
प्रतिरिच्य = अलावा (अतिरिक्तम्)।
भवतु = अच्छा (अस्)।
समवायः = समूह (समाहारः, समुच्चयः)।
प्रथितः = प्रसिद्ध (प्रख्यातः, प्रसिद्ध)।
प्रतीकात्मकः = सांकेतिक (सांकेतिकः)।
कदाचित् = सम्भवतः (कदाचन्)।
साम्या = समानता के कारण (समानतया)।
उक्तोपाधिना = कही गई उपाधि से (कथितोपा धेना)।
नाम्नि = नाम में (नामके)।
संशयः = सन्देह (सन्देहः)।
अपरतः = दूसरी ओर (अन्यतः)।
क्षेत्रपरिमाणैः = क्षेत्रफल से (क्षेत्रफलैः)।
बृहत्तराणि = बड़े (विशालानि)।
स्वाधीना: = स्वतन्त्र (स्वतन्त्राः)।
महत्त्वाधायिनी = महत्त्व को रखने वाली (महत्त्वशालिनी)।
प्रभृतिभिः = आदि से (आदिभिः)।
विहित्तम् = विधिपूर्वक किया गया (सम्यककृतम्)।
पुष्पस्तबकसदृशानि = फूलों के गुच्छे के समान (कुसुमगुच्छसदृशानि)।
हृद्या = पारी (मनोहरा, प्रिया, रम्या)।
सावहितमनसा = सावधान मन में (सावधान चित्तेन)।
ऊर्जस्विनः = ऊर्जा युक्त (शक्तिमन्तः)।
परिपूरिताः = पूर्ण (सम्पूर्णाः)।
आम् = हाँ (बाढम्)।
अवाप्तः = प्राप्त (प्राप्तः)।
सार्द्धम् = साथ (सह)।
चलतु = चलो (आगच्छतु)।

सरलार्थः
अध्यापिका – सुप्रभात।

छात्रगण – सुप्रभात। सुप्रभात।

अध्यापिका – ठीक है। आज क्या पढ़ना है?

छात्रगण – हम सब अपने देश के राज्यों (प्रदेशों) के विषय में जानना चाहते हैं।

अध्यापिका – ठीक है। बोलो। हमारे देश में कितने राज्य है?

सायरा – चौबीस, महोदया।

सिल्वी – नहीं, नहीं महोदया! पच्चीस राज्य हैं।

अध्यापिका – दूसरा कोई भी?

स्वरा – (बीच में ही) महोदया! मेरी बहन कहती है- कि हमारे देश में अट्ठाईस राज्य हैं। इसके अलावा सात केन्द्रशासित प्रदेश भी हैं।

अध्यापिका – सही जानती है तुम्हारी बहन। उचित है, क्या तुम सब जानते हो कि इन राज्यों में सात राज्यों का एक समूह है जो ‘सात बहनें’ इस नाम से प्रसिद्ध है।

सभी – (आश्चर्य सहित परस्पर देखते हुए) सात बहनें? सात बहनें?

निकोलस – ये सात राज्य ‘सात बहनें’ क्यों कहे जाते हैं?

अध्यापिका – यह प्रयोग सांकेतिक है। सम्भवतः सामाजिक व सांस्कृतिक परिदृश्यों की समानता से यह उपाधि प्रसिद्ध है।

समीक्षा – मेरा कुतूहल शान्त नहीं हो रहा है। सुनाइए तो वे कौन-से राज्य हैं?

अध्यापिका – सुनिये!
दो ‘अ’ (‘अ’ से आरम्भ होने वाले), तीन ‘म’ (‘म’ से आरम्भ होने वाले), एक ‘न’ (‘न’ से आरम्भ होने वाला) तथा एक ‘त्रि’ (‘त्रि’ से आरम्भ होने वाला) से युक्त ये दो। यह सात राज्यों का समूह भगिनीसप्तक माना गया है। इस प्रकार भगिनी सप्तक में ये राज्य हैं-
1. अरुणाचल प्रदेश
2. असम
3. मणिपुर
4. मिजोरम
5. मेघालय
6. नगालैण्ड
7. त्रिपुरा।
जबकि क्षेत्रफल में ये छोटे हैं फिर भी गुण और गौरव की दृष्टि से बहुत बड़े हैं। सभी – कैसे? कैसे?

अध्यापिका – य सात बहनें अपने प्राचीन इतिहास में प्रायः स्वतन्त्र ही दिखती हैं। किसी भी शासक ने इन्हें अपने अधीन नहीं किया था। अनेक संस्कृति की विशेषता वाली भारत भूमि में इन बहनों की संस्कृति विशेष महत्त्व वाली है।

तन्वी – यह शब्द सबसे पहले कब प्रयुक्त हुआ?

अध्यापिका – सुनने में मधुर लगने वाला यह शब्द सबसे पहले पिछली शताब्दी के बहत्तरवें वर्ष (1972) में त्रिपुरा राज्य के उद्घाटन के क्रम में किसी ने फैलाया। इस समय फिर से इन राज्यों का संगठन किया गया।

स्वरा – दूसरी भी कोई विशेषता है इनकी?

अध्यापिका – अवश्य ही है। पर्वत, वृक्ष, पुष्प आदि प्राकृतिक सम्पदाओं से समृद्ध हैं ये राज्य। ये भारत रूपी वृक्ष में फूलों के गुलदस्ते के समान सुशोभित हैं।

राजीव – आप! जैसे घर में बहन सबसे अधिक प्रिय और मनोहर होती है वैसे ही भारत रूपी घर में ये सात बहनें सबसे मनोहर हैं।

अध्यापिका – तुम्हारे मन में आई हुई यह भावना बहुत कल्याण वाली है, परन्तु सभी ऐसा नहीं समझते हैं। ठीक है, इनके विषय में कुछ विशेप कथनीय है। सावधान मन से सुनिए- यह प्रदेश जनजातियों से बहुल है। गारो, खासी, नगा, मिजो आदि अनेक जनजातियाँ यहाँ रहती हैं। शरीर से इस प्रदेश के लोग अनेक भाषाओं से युक्त, पर्वो की परम्पराओं वाले, अपने करतबों और कलाओं में कुशल हैं।

मालती – महोदया! वहाँ तो बाँस के पेड़ भी पाए जाते है।

अध्यापिका – हाँ। इस प्रदेश में हस्तकला की प्रमुखता है। यहाँ वस्त्रों व आभूषणों से लेकर गृहनिर्माण तक अक्सर बाँस के पेड़ से बनी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि यहाँ बाँस के पेड़ों की अधिकता है। अब यहाँ का बाँस उद्योग अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि पा चुका है।

अभिनव – यह बहनों वाला प्रदेश बहुत आकर्षक है।

सलीम – क्या यह प्रदेश भ्रमण के लिए उचित है?

सभी छात्र – (जोर से) महोदया! आगामी अवकाश में हम वहीं जाना चाहते हैं।

स्वरा – आप भी हमारे साथ चलिए।

अध्यापिका – गह विनार मुझे प्रिय है। ये राज्य भ्रमण के लिए स्वर्ग के समान हैं।

NCERT Solutions for Class 7 Social Science Geography Chapter 6 Natural Vegetation and Wild Life

Natural Vegetation and Wild Life Class 7 Questions and Answers Geography Chapter 6

Class 7 Geography Chapter 6 NCERT Textbook Questions and Answers

Question 1.
Answer the following questions :
(i) Which are the two factors on which the growth of vegetation mostly depends?
Answer:
The growth of vegetation mostly depends on the following factors :
(a) Temperature
(b) Moisture.

(ii) Which are the three broad categories of natural vegetation?
Answer:
The three broad categories of natural vegetation are :
(a) Forests
(b) Grasslands
(c) Shrubs

(iii) Name the two hardwood trees commonly found in tropical evergreen forest?
Answer:
Rosewood, Ebony, Mahogany etc.

(iv) In which part of the world are tropical deciduous forest found?
Answer:
These forests are found in the large part of India, Northern Australia and in Central America.

(v) In which climatic conditions citrus fruits cultivated?
Answer:
Hot dry summer and rainy mild winter season is good for the cultivation of citrus fruits.

(vi) Mention the uses of coniferous forest.
Answer:
The uses of coniferous forests are as follows :

  1. The wood are very useful for making pulp, which is used for manufacturing paper and newsprint.
  2. Match boxes and packing boxes are also made from softwood.

(vii) In which part of the world is seasonal grassland found?
Answer:
Seasonal grasslands are found in the mid-latitudinal zones and in the interior parts of the continents.

Question 2.
Tick the correct answer :
(i) Mosses and Lichens are found in :
(a) Desertic vegetation
(b) Tropical evergreen forest
(c) Tundra vegetation
Answer:
(c) Tundra vegetation.

(ii) Thorny bushes are found in :
(a) Hot and humid tropical climate
(b) Hot and dry desertic climate
(c) Cold polar climate
Answer:
(b) Hot and dry desertic climate.

(iii) In tropical evergreen forest, one of the common animals is :
(a) Monkey
(b) Giraffe
(c) Camel
Answer:
(a) Monkey.

(iv) One important variety of coniferous forest is :
(a) Rosewood
(b) Pine
(c) Teak
Answer:
(b) Pine.

(v) Stepps grassland is found in :
(a) S. Africa
(b) Australia
(c) Russia
Answer:
(c) Russia.

Question 3.
Match the following :

(i) Walrus (a) Soft wood tree
(ii) Cedar (b) An animal of tropical deciduous forest
(iii) Olives (c) A polar animal
(iv) Elephants (d) Temperate grassland in Antarctica
(v) Campos (e) A citrus fruit
(vi) Downs (f) Tropical grassland of Brazil

Answer:

(i) Walrus (c) A polar animal
(ii) Cedar (a) Soft wood tree
(iii) Olives (e) A citrus fruit
(iv) Elephants (b) An animal of tropical deciduous forest
(v) Campos (f) Tropical grassland of Brazil
(vi) Downs (d) Temperate grassland in Antarctica

Question 4.
Give reasons :
(i) The animals in polar region have thick fur and thick skin.
Answer:
The animals in polar region have thick fur and thick skin to protect themselves from the cold climate conditions.

(ii) Tropical deciduous trees shed their leaves in the dry season.
Answer:
Tropical deciduous trees shed their leaves in dr}’ season to conserve water.

(iii) The type and thickness of vegetation changes from piace to place.
Answer:
The type and thickness of natural vegetation changes from place to place because it depends on the factors like slope and thickness of soil.

Question 5.
Activity-
(i) Collect pictures and photographs of forests and grasslands of different parts of world. Write one sentence below each picture.
Answer:
These forests are found in a broad belt, laying between 50° N to 70° N latitudes. This belt is around the north polar region. The trees of these forests are tall, straight, evergreen with narrow needle like leaves.

Majority of the plant in Tundra region are comparatively small and grow close the ground. The main vegetation of the Tundra is mosses, lichens, grasses and dwarfs shrubs.
NCERT Solutions for Class 7 Social Science Geography Chapter 6 Natural Vegetation and Wild Life 1

Question 6.
In the crossword table given below, some words are hidden. They are all about vegetation and wildlife and are to be found horizontally and vertically. Two have been worked out for you. Work in pairs with a friend.
NCERT Solutions for Class 7 Social Science Geography Chapter 6 Natural Vegetation and Wild Life 2
Answer.
Horizontally:
Bamboo, Bear, Whale, Flora, Lichen, Hen, Pine, Seal, Fowl, Chir, Mosses, Grass, Taiga, Tulsi, Prairie, Fir, Ebony, Goat, Deciduous, Tundra, Zebra, Horse, Lanos, Pampas,
Vertically:
Shrub, Ox, Pig, Cactus, Fauna, Lion, Downs, Tiger, Neem, Oak, Camel, Peepal, Owl, Deer, Savanna, Yak.
Do more exercise and find out other names of vegetation and wildlife. Elephant, Palm, Grebon.

NCERT Solutions for Class 7 Social Science

NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

Shemushi Sanskrit Class 10 Solutions Chapter 6 सुभाषितानि

अभ्यासः

प्रश्ना 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उनराणि संस्छतभाषया लिखत-
(क) केन समः बन्धुः नास्ति?
उत्तर:
उद्येमेन् समः बन्धुः नास्ति।

(ख) वसन्तस्य गुणं क: जानाति।
उत्तर:
वसन्तस्य गुणं पिकः जानाति।

(ग) बुद्धयः कीदृश्यः भवन्ति?
उत्तर:
बुद्धयः परेग्रिज्ञानफलाः भवन्ति।

(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः कः?
उत्तर:
नराणां प्रथमः शत्रुः देहस्थितः क्रोधः भवति।

(ङ) सुधियः सख्यं केन सह भवति?
उत्तर:
सुधियः सख्यं सुधीभिः सह भवति?

(च) अस्माभिः कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः?
उत्तर:
अस्माभिः फलच्छाया-समन्वितः वृक्षः सेवितव्यः?

प्रश्ना 2.
अधोलिखिते अन्वयद्वये रिक्तस्थानपूर्ति कुरुत-
(क) यः …………….. उपिश्य प्रकुप्यति तस्य ………………. सः मुमुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि अस्ति, ……………… तं कथं परितोषयिष्यति?
(ख) ……….. संसारे खलु ……….. निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् ……………… वीरः, खरः …………… वहने (वीरः) (भवति)
उत्तर:
(क) निमित्तम्, उपगमे, जनः
(ख) विचित्रे, किञ्चित, धावने, भारस्य

प्रश्ना 3.
अधोलिखितानां वाक्यानां कृते समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखत
(क) विद्वान् स एव भवति यः अनुक्तम् अपि तथ्यं जानाति।
उत्तर:
अनुक्तमप्यूहति पाण्डितोजनः परेग्रितज्ञानफलाहि बुद्धयः।

(ख) मनुष्यः समस्वभावैः जनैः सह मित्रतां करोति।
उत्तर:
समान-शील-व्यवसनेषु सख्यम्।

(ग) परिश्रम कुर्वाणः नरः कदापि दुःखं न प्राप्नोति।
उत्तर:
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।

(घ) महान्तः जनाः सर्वदैव समप्रछतयः भवन्ति।
उत्तर:
संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।

प्रश्ना 4.
यथानिर्देशं परिवर्तनं विधाय वाक्यानि रचयत-
(क) गुणी गुणं जानाति। (बहुवचने)
उत्तर:
गुणिनः गुणं जानन्ति।

(ख) पशुः उदीरितम् अर्थ गृह्णाति। (कर्मवाच्ये)
उत्तर:
पशुभिः उदीरित अर्थः गृहयते।

(ग) मृगाः मृगैः सह अनुव्रजन्ति। (एकवचने)
उत्तर:
मृगः मृगेण्ः सह अनुव्रजति।

(घ) कः छायां निवारयति। (कर्मवाच्ये)
उत्तर:
केन् छायां निवार्यते?

(ङ) तेन एव वह्निना शरीरं दह्यते। (कर्तृवाच्ये)
उत्तर:
सा एव वहिन शरीरं दहति।

प्रश्ना 5.
(अ) सन्मिां/सन्मिाविच्छेदं कुरुत-
(क) न + अस्ति + उद्यमसमः – ………..
उत्तर:
न + अस्ति + उद्यमसमः – नास्त्युद्यमसमः

(ख) ……. + ……….. – तस्यापगमे
उत्तर:
तस्य + अपगमे – तस्यापगमे

(ग) अनुक्तम् + अपि + ऊहति – ……….
उत्तर:
अनुक्तम् + अपि + ऊहति – अनक्तमप्यूहति

(घ) ………. + ………. – गावश्च
उत्तर:
गावः + च – गावश्च

(ङ) ……….. + ………. – नास्ति
उत्तर:
न + अस्ति – नास्ति

(च) रक्तः + च + अस्तमये – ………..
उत्तर:
रक्तः + च + अस्तमये – रक्तश्चास्तमर्ये

(छ) ……. + ……….. – योजकस्तत्र
उत्तर:
योजकः + तत्र – योजकस्तत्र

(आ) समस्तपदं/विग्रहं लिखत।
(क) उद्यमसमः …………….
उत्तर:
उद्यमसमः – उद्यमे समः

(ख) शरीरे स्थितः …………….
उत्तर:
शरीरे स्थितः – शरीरस्थः

(ग) निर्बलः …………….
उत्तर:
निर्बलः – बलानाम् अभावः

(घ) देहस्य विनाशनाय …………….
उत्तर:
देहस्य विनाशनाय – देहविनाशनाय

(ङ) महावृक्षः …………….
उत्तर:
महावृक्षः – महान च असौ वृक्षः

(च) समानं शीलं व्यसनं येषां तेषु …………….
उत्तर:
समानं शीलं व्यसनं येषां तेषु – समानशीलव्यसनम्

(छ) अयोग्यः …………….
उत्तर:
अयोग्यः – न योग्यः

प्रश्ना 6.
अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा
लिखत(घ) केन् छायां निवार्यते?
(क) प्रसीदति – ………………….
उत्तर:
प्रसीदति – अवसीदति

(ख) मूर्खः – ………………….
उत्तर:
मूर्खः – सुधी

(ग) बली – ………………….
उत्तर:
बली – निर्बलः

(घ) सुलभः – ………………….
उत्तर:
सुलभः – दुर्लभः

(ङ) संपत्ती – ………………….
उत्तर:
संपत्ती – विपत्ती

(च) अस्तमये – ………………….
उत्तर:
अस्तमये – उदये

(छ) साथर्कम् – ………………….
उत्तर:
साथर्कम् – निरर्थकम्

प्रश्ना 7.
संस्कृतेन वाक्यप्रयोगं कुरुत-
(क) वायसः …………….
उत्तर:
वायसः वायसः कर्कश ध्वनि करोति।

(ख) निमिनम् ……………..
उत्तर:
निमित्तम् निमित्तम कोऽपि भवति।

(ग) सूर्यः ………….
उत्तर:
सूर्यः सूर्यः प्रकाशम् ददाति।

(घ) पिकः ………………..
उत्तर:
पिकः पिकः मधुर गायति।

(ङ) वह्निः …………..
उत्तर:
वह्निः वहिन कं न दहति?

अन्य परिक्षोपयोगी प्रश्नाः

1. एकपदेन उत्तरत
(क) केषां सम्पत्तौ विपत्तौ च एकरूपता?
उत्तर:
महाताम्

(ख) कः सेवितव्यः?
उत्तर:
महावृक्षः

(ग) मृगाः कैः सह अनुव्रजन्ति?
उत्तर:
मृगैः

(घ) काष्ठं कः दहति?
उत्तर:
वह्निः

(च) मनुष्याणां शरीस्थो महान् रिपुः कः?
उत्तर:
आलस्यम्।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरत

(क) पशुना अपि क: गृह्यते?
उत्तर:
पशुना अपि उदीरितः अर्थः गृह्यते।

(ख) धावने वीरः कः भवति?
उत्तर:
धावने वीरः अश्वः भवति।

(ग) अनौषधं किं नास्ति?
उत्तर:
अनौषधं मूल नास्ति।

(घ) गुणं कः न वेत्ति?
उत्तर:
निर्गुणः गुणं न वेत्ति।

(च) बली के वेत्ति?
उत्तर:
बली बलं वेत्ति।

3. पूर्णवाक्येन उत्तरत

(क) ‘वह्निः’ इति कर्तृपदस्य क्रियापदं चित्वा लिखत।
उत्तर:
दहते

(ख) ‘विद्वांसः’ इति पदस्य विलोमपंद चित्वा लिखत।
उत्तर:
मूर्खा

(ग) ‘महात्मनाम्’ इति पदस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
उत्तर:
मताम्

(घ) ‘मूलम्’ इति कस्य विशेष्यपदम्?
उत्तर:
अनोषधम्

(च) ‘अयोग्यः पुरुषः’ अनयोः विशषणं किम्?
उत्तर:
अयोग्यः

योग्यताविस्तारः

1. तत्पुरुष समास

शरीरस्थः – शरीरे स्थितः
गृहस्थः – गृहे स्थितः
मनस्स्थः – मनसि स्थितः
तटस्थः – तटे स्थितः
कूपस्थः – कूपे स्थितः
वृक्षस्थः – वृक्षे स्थितः
विमानस्थः – विमाने स्थितः

2. अव्ययीभाव समास

निर्गुणम् – गुणानाम् अभाव;
निर्मक्षिकम् – मक्षिकाणाम् अभावः
निर्जलम् – जलस्य अभावः
निराहारम् – आहारस्य अभावः

3. पर्यायवाचिपदानि

शत्रुः – रिपुः, अरिः, वैरिः
मित्रम् – सखा, बन्धुः, सुहृद्
वह्निः – अग्निः, दाहकः, पावकः
सुधियः – विद्वांसः, विज्ञाः, अभिज्ञाः
अश्वः – तुरगः, हयः, घोटकः
गजः – करी, हस्ती, दन्ती, नागः।
वृक्षः – द्रुमः, तरुः, महीरुहः।
सविता – सूर्यः, मित्रः, दिवाकरः, भास्करः।

मन्त्रः-
‘मननात् त्रायते इति मन्त्रः।
अर्थात् वे शब्द जो सोच-विचार कर बोले जाएँ। सलाह लेना, मन्त्रणा करना। मन्त्र्+अच् (किसी भी देवता को सम्बोधित) वैदिक सूक्त या प्रार्थनापरक वैदिक मन्त्र। वेद का पाठ तीन प्रकार का है- यदि छन्दोबद्ध और उच्च स्वर से बोला जाने वाला है तो ‘ऋक्’ है, यदि गद्यमय और मन्दस्वर में बोला जाने वाला है तो ‘यजुस्’ है, और यदि छन्दोबद्धता के साथ गेयता है तो ‘सामन्’ है (प्रार्थनापरक)।

यजुस् जो किसी देवता को उद्दिष्ट करके बोला गया हो- ‘ओं नमः शिवाय’ आदि। पंचतंत्र में भी मंत्रणा, परामर्श, उपदेश तथा गुप्त मंत्रणा के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग हुआ है।

These Solutions are part of NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit. Here we have given NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि.

NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Shemushi Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम्

We have given detailed NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Shemushi Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम् Questions and Answers will cover all exercises given at the end of the chapter.

Shemushi Sanskrit Class 9 Solutions Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम्

अभ्यासः

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत –

(क) श्वेतकेतुः सर्वप्रथमम् आरुणिं कस्य स्वरूपस्य विषये पृच्छति?
उत्तर:
श्वेतकेतु सर्वप्रथमं आरुणिं मनसः स्वरूपस्य विषये पृच्छति।

(ख) आरुणिः प्राणस्वरूपं कथं निरूपयति?
उत्तर:
आरुणिः निरूपयतियत् “आपोमयो भवति प्राणाः।”

(ग) मानवानां चेतांसि कीदृशानि भवन्ति?
उत्तर:
मानवानां चेतांसि अशितान्नामुरूपाणि भवन्ति।

(घ) सर्पिः किं भवति?
उत्तर:
मथ्यमानस्य दनः योऽणुतमः यदुवं आयाति तत् सर्पिः भवति।।

(ङ) आरुणे: मतानसारं मनः कीदशं भवति?
उत्तर:
आरुणे: मतानुसारं मनः अन्नमय भवति।

प्रश्न 2.
(क) ‘अ’ स्तम्भस्य पदानि ‘ब’ स्तम्भेन दत्तैः पदैः सह यथायोग्यं योजयत –

NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Shemushi Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम् 1
उत्तर:
NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Shemushi Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम् 2

प्रश्न 2.
(ख) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदं पाठात् चित्वा लिखत –

  1. गरिष्ठः – ……………..
  2. अधः – ……………..
  3. एकवारम् – ……………..
  4. अनवधीतम् – ……………..
  5. किञ्चित् – ……………..

उत्तर:

  1. गरिष्ठः – अणिष्ठः
  2. अधः – ऊर्ध्वः
  3. एकवारम् – भूयोऽपि
  4. अनवधीतम् – अधीतम्
  5. किञ्चित् – भूयः

प्रश्न 3.
उदाहरणमनुसृत्य निम्नलिखितेषु क्रियापदेषु ‘तुमुन’ प्रत्ययं योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत –
यथा – प्रच्छ् + तुमुन् – प्रष्टुम्

(क) श्रु + तुमुन् – ……………..
(ख) वन्द् + तुमुन् – ……………..
(ग) पठ् + तुमुन् – ……………..
(घ) कृ + तुमुन् – ……………..
(ङ) वि + ज्ञा . तुमुन् – ……………..
(च) वि + आ + ख्या + तुमुन् – ……………..
उत्तर:
(क) श्रु + तुमुन् – श्रोतुम्
(ख) वन्द् + तुमुन् – वन्दितुम्
(ग) पठ् + तुमुन् – पठितुम्
(घ) कृ+तुमुन् – कर्तुम्
(ङ) वि + ज्ञा + तुमुन् – विज्ञातुम्
(च) वि + आ + ख्या + तुमुन् – व्याख्यातुम्

प्रश्न 4.
निर्देशानुसार रिक्तस्थानानि पूरयत –

(क) अहं किञ्चित् प्रष्टुम् …………..। (इच्छ-लट्लकारे)
(ख) मनः अन्नमयं …………..। (भू-लट्लकारे)
(ग) सावधानं ………….। (श्रु-लट्लकारे)
(घ) तेजस्विनावधीतम् ………..। (असू-लट्लकारे)
(ङ) श्वेतकेतुः आरुणेः शिष्यः ………………..। अस्-लङ्लकारे)
उत्तर:
(क) अह किञ्चित् प्रष्टुम् इच्छामि
(ख) मनः अन्नमयं भवति
(ग) सावधानं शृणु
(घ) तेजस्विनावधीतम् अस्तु
(ङ) श्वेतकेतुः आरुणे: शिष्यः आसीत्

प्रश्न 5.
उदाहरणनुसृत्य वाक्यानि रचयत –
यथा – अहं स्वदेशं सेवितुम् इच्छामि।

(क) …………….. उपदिशामि।
(ख) ……………. प्रणमामि।
(ग) ……………… आज्ञापयामि।
(घ) ………………… पृच्छामि।
(ङ) ……………. अवगच्छामि।
उत्तर:
(क) अहं शिष्यं उपदिशामि।
(ख) अहं गुरुं प्रणमामि।
(ग) अहं सेवकं आज्ञापयामि।
(घ) अहं गुरुं पृच्छामि।
(ङ) अहं मनसः स्वरूपं अवगच्छामि।

प्रश्न 6.
(क) सन्धिं कुरुत –

  1. अशितस्य + अन्नस्य ………………
  2. इति + अपि + अवधार्यम् ……………..
  3. का + इयम् ……………..
  4. नौ + अधीतम् ……………..
  5. भवति + इति ……………..

उत्तर:

  1. अशितस्य + अन्नस्य – अशितान्नस्य
  2. इति + अपि + अवधार्यम् – इत्यप्यवधार्यम्
  3. का + इयम् – केयम्
  4. नौ + अधीतम् – नावधीतम्
  5. भवति + इति – भवतीति

प्रश्न 6.
(ख) स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

(i) मथ्यमानस्य दध्यः अणिमा ऊर्ध्वं समुदीषति।
उत्तर:
कीदृशः दधनः अणिमा ऊर्ध्व समुदीषति?

(ii) भवता घृतोत्पत्तिरहस्यं व्याख्यातम्।
उत्तर:
घृतोत्पत्तिरहस्यं व्याख्यातम्?

(iii) आरुणिम् उपगम्य श्वेतकेतुः अभिवादयति।
उत्तर:
आरुणिं उपगम्य कः अभिवादयति?

(iv) श्वेतकेतुः वाग्विषये पृच्छति।
उत्तर:
श्वेतकेतुः कस्य विषये पृच्छति?

प्रश्न 7.
पाठस्य सारांशं पञ्चवाक्यैः लिखत –

  • पाठे आरुणिः श्वेतकेतु विज्ञापयति। यत्
  • अन्नमयं भवति मनः
  • आपोमयो भवति प्राणाः।
  • तेजोमयी भवति वाक्।
  • मनुष्यः या दृशमन्नादिक खादति तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवति।

व्याकरणात्मक: बोधः

1. पदपरिचयः – (क)

  • भगवन् – भगवन् शब्द, सम्बोधन, एकवचन। हे भगवान। (गुरु, पिता)
  • मन: – मनस् शब्द, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। मन।
  • अपाम् – अप् शब्द, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन। जल का। यह शब्द नित्य बहुवचनान्त प्रयुक्त होता है।
  • तेजस: – तेजस् शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचन। अग्नि का।
  • नौ – आवयोः की जगह प्रयुक्त। हम दोनों का।

पदपरिचयः – (ख)

  • समुदीषति – सम् + उद् + इ + लट्लकार, प्र.पु. , एकवचन। ऊपर आ जाता है, उठ जाता है।
  • इच्छमि – इष् धातु, लट्लकार, प्र.पु., एकवचन। चाहता हूँ।
  • शृणु – श्रू धातु, लट्लकार, मध्यम प्र.पु., एकवचन। सुनो।
  • विज्ञापयतु – वि + ज्ञा + लट्लकार, प्र.पु., एकवचन। (आप) शिक्षा दें।

2. प्रकृतिप्रत्ययविभाग:

  • अन्नमयम् – अन्न + मयट्
  • आपोमयः – आप: + मयट्
  • तेजोमयी – तेजः + मयी
  • मयट् प्रत्यय (तद्धित) विकार (अवयव) अर्थ में प्रकृति (शब्द) के पीछे जुड़ता है। ‘अन्नमयम्’ का अर्थ अन्न (प्रकृति) का विकार (एक अवयव) – मन। एकमन्यत्र ज्ञेयम्।
  • प्रष्ट्रम् – प्रच्छ + तुमुन् (पूछने के लिए) प्रष्टव्यम्-प्रच्छ + तव्यम् (पूछने के योग्य)
  • अशितस्य – अश् + क्तः षष्ठी विभक्ति. एकवचन। (मधे जाते हुए का)
  • अवधार्यम् – अव + धृ + व्यत् (धारण करने योग्य)

परिशिष्ट

  • अणिष्ठः – अणु + इष्ठ (सबसे छोटा)
    इसका विपरीतार्थक शब्द
  • गरिष्ठः – गुरु + इष्ठ (सबसे बड़ा, भारी)
    इस प्रकार,
  • उरु + इष्ठ = वरिष्ठ (सबसे ऊपर) बड़ा.
  • युवन् + इष्ठ – कनिष्ठ (सबसे छोटा)
  • प्रशस्य + इष्ठ – ज्येष्ठ (सबसे बड़ा)
  • बल + इष्ठ = बलिष्ठ (सबसे बलवान्)
  • प्रिय + इष्ठ – प्रेष्ठ (सबसे प्रिय)
  • प्रशस्य + इष्ठ = श्रेष्ठ (सबसे उत्तर)
  • अणिमा = अणु + इमनिन्। (अणु (सूक्ष्मता) का भाव)
    इसी प्रकार
  • गुरु + इमनिच् = गरिमा (बड़प्पन का भाव)
  • लघु + इमनिच् = लघिमा (छोटेपन का भाव)

Class 9 Sanskrit Shemushi Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम् Summary Translation in Hindi

सन्दर्भ – प्रस्तुत पाठ हमारी पाठ्य – पुस्तक (संस्कृत) ‘शेमुषी’ प्रथमोभागः में संकलित है। यह पाठ छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय से संग्रहीत है। इसमें मन, प्राण तथा वाक् के स्वरूप का वर्णन बड़े रोचक संवाद के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

श्वेतकेतुः – भगबन्। श्वेतकेतुरहं बन्दे।
श्वेतकेतु – हे पूज्या मैं श्वेतकेतु आपको प्रणाम करता हूँ।
आरुणिः – वत्स! चिरञ्जीव।
आरुणि – पुत्र, चिरकाल तक जीओ।
श्वेतकेतुः – भगवन्! किञ्चित्प्रष्टुमिच्छामि।
श्वेतकेतु – पूज्य! (आपसे) कुछ पूछना चाहता हूँ।
आरुणि: – वत्स! किमद्य त्वया प्रष्टव्यमस्ति?
आरुणि – पुत्र! आज तुम्हें क्या पूछना है?
श्वेतकेतुः – भगवन्! प्रष्टुमिच्छामि किमिदं मनः?
श्वेतकेतु – हे पूज्य! मैं यह पूछना चाहता हूँ कि यह मन क्या है?
आरुणिः – वत्स! अशितस्यान्नस्य योऽणिष्ठः तन्मनः।

आरुणि – पुत्र! खाए हुए अन्न का जो सबसे सूक्ष्म (लघुत्तम) भाग है, वही मन है। अर्थात् अन्न ही सार रूप में ‘मन’ में परिणत होता है।
श्वेतकेतु: – कश्च प्राणः? श्वेतकेतु – और प्राण कौन (क्या) है?
आरुणि: – वत्स! अशितस्य तेजसा योऽणिष्ठः सा वाक्। सौम्य! मनः अन्नमयं, प्राणः आपोमयः वाक् च तेजोमयी भवति इत्यप्यवधार्यम्।
आरुणि। पुत्र! खाए हुए अन्न से उत्पन्न तेज (ऊर्जा) का जो सबसे सूक्ष्म (छोटा) भाग है, वह वाणी है। अर्थात् ऊर्जा ही सार रूप में वाणी में परिणत होती है। “हे सुशील! यह मन अन्न का विकार होता है, प्राण जल का तथा वाणी तेज (ऊर्जा) का विकार होती है। यह भी समझने योग्य है।”
श्वेतकेतुः – भगवन्! भूय एव मां विज्ञापयतु। श्वेतकेतु – हे पूज्य! मुझे एक बार पुनः समझाएं।
आरुणिः – सौम्य! सावधानण। मथ्यमानस्य दनः योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीपति। तत्सर्पिः भवति।
आरुणि – हे सौम्य! सावधान होकर सुनो। मथे जाते हुए दही का लघुत्तम साररूप जो भाग है, वह ऊपर उठ जाता है और वही धृत (घी) होता है।
श्वेतकेतुः – भगवन्! व्याख्यातं भवता घृतोत्पत्तिरहस्यम्। भूयोऽपि श्रोतुमिच्छामि।

श्वेतकेतु – पूज्य! आपने धृत की उत्पत्ति के रहस्य का वर्णन कर दिया। इसके आगे भी कुछ और सुनना चाहता है।
आरुणिः – एवमेव सौम्य! अश्यमानस्य अन्नस्य योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। तन्मनो भवति। अवगतं न वा?
आरुणि – हे सुशील! इसी तरह जो अन्न (प्राणी के द्वारा) खाया जाता है, उसका जो सबसे छोट भाग है, वह ऊपर उठ जाता है और वही मन होता है। समझे या नहीं?
श्वेतकेतुः – सम्यगवगतं भगवन्! श्वेतकेतु – अच्छी प्रकार से समझ गया पूज्य।
आरुणि: – वत्स! पीयमानानाम् अपां योऽणिमा स ऊर्ध्व: समुदीपति स एव प्राणो भवति।
आरुणि – पुत्र! (प्राणियों के द्वारा) जो पानी पोया जाता है, उसका जो सबसे सूक्ष्मतम रूप है जो ऊपर उठता है, वह ही प्राण होता है।
श्वेतकेतु: – भगवन्! वाचमपि विज्ञापयतु। श्वेतकेतु – वे वन्द्य! वाणी के विषय में भी समझाएं।

आरुणिः – सौम्य अश्यमानस्य तेजसो योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। सा खलु वाग्भवति। वत्स! उपदेशान्ते भूयोऽपि त्वा विज्ञापयिमतुमिच्छामि यदन्नमयं भवति मनः, आपोमयो भवति प्राणास्तेजोमयी च भवति वागिति। किञ्च यादृशमन्नादिकं गृह्णाति मानवस्तादृशमेव तस्य चित्तादिक भवतीति मदुपदेशसारः। वत्स। एतत्सर्व हदयेन अवधारय।
आरुणि – हे सौम्य! (प्राणियों के द्वारा) जो तेजोयुक्त अन्न (धृत, चिकनाई आदि) खाया जाता है, उससे उत्पन्न तेज (ओज) का जो सूक्ष्मतम स्वरूप है तथा जो ऊपर उठता है, निश्चय ही वह वाणी होती है। पुत्र! इस उपदेश के अन्त में मैं एक बार पुनः बार पुन: तुम्हें समझाना चाहता हूँ कि (खाए गए) अन्न का ही परिणाम (विकार) मन होता है अर्थात् प्राणी जैसा अन्न सात्विक! राजसी! तामसी खाता है, उसका वैसा ही मन बन जाता है। इसी तरह (पीये गए) जल का परिणाम (विकार) ही प्राण होता है अर्थात् प्राण जलमय होता है। अर्थात् जल ही प्राण रूप में परिणत होता है। तथा खाए हुए धृत आदि अन्न से उत्पन्न तेज (शक्ति) का ही परिणाम (विकार) वाणी होता है। अर्थात् तेजोयुक्त पदार्थ (अन्न) खाने से वाणी में ओज का प्रवाह आता है। और अधिक क्या? मनुष्य जैसा भी अन्न आदि खाता है वैसा ही उसका मन आदि हो जाता है, यही मेरे उपदेश (शिक्षा) का सार है। पुत्र! यह सारा (ज्ञान) अपने हृदय में धारण कर लो।

श्वेतकेतुः – यदाज्ञापयाति भवगत् एष प्रणमामि।
श्वेतकेतु – जैसी आप आज्ञा दें पूज्य। यह (मैं) प्रणाम करता हूँ अर्थात् विदा लेता हूँ।
आरुणि – पुत्र! आयुष्मान होओ (जीते रहो) हम दोनों (गुरु – शिष्य) के द्वारा अधीत (गृहीत) ज्ञान तेजोयुक्त हो अर्थात् हमारे द्वारा गृहीत ज्ञान दिव्य हो।

NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः

We have given detailed NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Ruchira Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः Questions and Answers will cover all exercises given at the end of the chapter.

NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Ruchira Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः

अभ्यास के प्ररनौं के उत्तर

प्रश्न 1.
उच्चारणं कुरुत
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 1
उत्तर
छात्राः स्वयमेव उच्चारणं कुर्वन्तु।

प्रश्न 2.
उदाहरणम् अनुसृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 2
उत्तर
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 3

प्रश्न 3.
प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत
(क) निर्भय जनं कः स्वयमेव रक्षति ?
उत्तर
ईश्वरः।

(ख) पार्वती तपस्यार्थं कुत्र अगच्छत् ?
उत्तर
वनम्।

(ग) कः अशिवं चरति ?
उत्तरम्-
शिवः।

(घ) शिवनिन्दां श्रुत्वा का क्रुद्धा जाता ?
उत्तर
पार्वती।

(ङ) वटुरूपेण तपोवनं कः प्राविशत् ?
उत्तर
शिवः।

प्रश्न 4.
कः/का कं/कां प्रति कथयति
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 4
उत्तर
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 5

प्रश्नः 5.
प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत

(क) वटुं दृष्ट्वा पार्वती सादरं किम् अवदत् ?
उत्तर
सा अवदत्-“वटो, स्वागतं ते। उपविशतु भवान्।”

(ख) वटुः पार्वतीं किम् अपृच्छत् ?
उत्तर
वटुः अपृच्छत्-“हे पार्वति ! किमर्थं कठिनं तप: समाचरसि ?”
अथवा
वटुः अपृच्छत्-“हे पार्वति ! किं सत्यमेव त्वं शिवं | पतिमिच्छसि ?”

(ग) नारदवचनप्रभावात् पार्वती किं कर्तुम् ऐच्छत् ?
उत्तर
नारदवचनं प्रभवात् पार्वती तपस्यां कर्तुम् ऐच्छत्।

प्रश्न 6.
मञ्जूषातः पदानि चित्वा समानार्थकानि पदानि लिखत
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 6
वने …………
पशवः ……………….
जननी ……………….
नयनानि ……………….
विलोक्य ……………….
उत्तर
वने – कानने
पशवः – जन्तवः
जननी – माता
नयनानि – नेत्राणि
विलोक्य – दृष्ट्वा
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 7

प्रश्न 7.
उदाहरणानुसारं पदरचनां कुरुत
(क) यथा – वसति स्म = अवसत्।
(क) पश्यति स्म = …………….
(ख) लिखति स्म = …………….
(ग) चिन्तयति स्म = …………….
(घ) वदति स्म = …………….
(ङ) गच्छति स्म = …………….
उत्तर
(क) पश्यति स्म = अपश्यत्
(ख) लिखति स्म = अलिखत्
(ग) चिन्तयति स्म = अचिन्तयत्
(घ) वदति स्म = अवदत्
(ङ) गच्छति स्म = अगच्छत्
(ख) यथा-अलिखत् = लिखति स्म
(क) ………. = कथयति स्म
(ख) …………….. = नयति स्म
(ग) ……………… = पठति स्म
(घ) ………….. = धावति स्म
(ङ) …………….. = हसति स्म
उत्तर
(क) अकथयत् = कथयति स्म
(ख) अनयत् = नयति स्म
(ग) अपठत् = पठति स्म
(घ) अधावत् = धावति स्म
(ङ) अहसत् = हसति स्म

ध्यातव्यम्

‘स्म’ इत्यस्य प्रयोगः।
यदा वर्तमानकालिकैः धातुभिः सह ‘स्म’ इत्यस्य प्रयोग: भवति तदा ते धातवः भूतकालिकक्रियाणाम् अर्थ प्रकटयन्ति।

यथा-पठति स्म – पढ़ता था।
गच्छति स्म – जाता था।
लट्लकार वर्तमान काल के क्रियापद के साथ ‘स्म’ अव्यय का प्रयोग होता है और फिर उस क्रियापद का अर्थ भूतकालवाचक हो जाता है।

जैसेपठति = पढ़ता है।
पठति स्म = पढ़ता था।
गच्छति = जाता है।
गच्छति स्म = जाता था।
पठामि = पढ़ता हूँ।
पठामि स्म = पढता था।
गच्छसि = (तुम) गच्छसि
स्म = (तुम) जाते जाते हो।

बहुविकल्पी प्रश्न

(i) कस्याः माता चिन्ताकुला अभवत् ?
(A) ब्रह्मचारिणः
(B) पार्वत्याः
(C) हिमालयस्य
(D) शिवस्य।
उत्तर
(B) पार्वत्याः

(ii) निर्भयं जनं कः स्वयमेव रक्षति ?
(A) ईश्वरं
(B) पतिः
(C) पिता
(D) जननी।
उत्तर
(A) ईश्वरं

(iii) पार्वती तपस्यार्थं कुत्र अगच्छत् ?
(A) गृहम्
(B) वनम्
(C) नगरम्
(D) न कुत्रापि।
उत्तर
(B) वनम्

(iv) कः अशिवं चरति ?
(A) तापसी
(B) जनक:
(C) अशिवः
(D) शिवः।
उत्तर
(D) शिवः।

(v) शिवनिन्दां श्रुत्वा का क्रुद्धा जाता ?
(A) जननी
(B) मनोरमा
(C) पार्वती
(D) रमा।
उत्तर
(C) पार्वती

(vi) वटुरूपेण तपोवनं कः प्राविशत् ?
(A) इन्द्रः
(B) शिवः
(C) यमः
(D) नारदः।
उत्तर
(B) शिवः

(vii) कस्याः कोमलतनुं दृष्ट्वा जननी आदिशत् ?
(A) पार्वत्याः
(B) सुमत्याः
(C) जनन्याः
(D) वन्याः
उत्तर
(A) पार्वत्याः

(viii) कुत्र हिंस्राः पशवः विचरन्ति ?
(A) नगरे
(B) गृहे
(C) मन्दिरे
(D) वने।
उत्तर
(D) वने।

(ix) पार्वत्याः तपस्यया कः प्रीत: अभवत् ?
(A) नरः
(B) वानरः
(C) शिवः
(D) यमः।
उत्तर
(C) शिवः

(x) वने का निर्भया वसति स्म ?
(A) शृगाली
(B) सिंही
(C) लक्ष्मी
(D) पार्वती।
उत्तर
(D) पार्वती।

Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः Summary Translation in Hindi

1. नारदवचनप्रभावात् पार्वती शिवं पतिरूपेण इच्छन्ती तपस्या कर्तुम् इच्छति स्म। सा स्वसङ्कल्यं मात्रे न्यवेदयत्। तच्छ्रुत्वा पार्वत्याः माता चिन्ताकुला अभवत्। पुत्र्याः कोमलतनुं दृष्ट्वा जननी आदिशत्-“वत्से! क्व कठिनं तपः क्व च तव कोमलं शरीरम् ? कथम् आतपात् शीतात् वा आत्मानं रक्षिष्यसि ?” तर्हि तपः मा चर। सुखेन स्वगृहे एव वस। अत्रैव व्रतादिकं कुरु । एतेनैव तव मनोरथपूर्तिः भविष्यति।”

शब्दार्थाः-
नारदवचनप्रभावात् = नारद के वचन के प्रभाव से।
पतिरूपेण = पति के रूप में।
इच्छन्ती = इच्छा करती हुई।
कर्तुम् = करने के लिए।
इच्छति स्म = इच्छा की।
स्वसङ्कल्पम् = अपने संकल्प को।
मात्रे = माता से, माता को।
न्यवेदयत् (नि + अवेदयत्) = निवेदन किया, कहा।
तच्छ्रुत्वा (तत् + श्रुत्वा) = यह सुनकर।
पार्वत्याः = पार्वती की।
चिन्ताकुला = चिन्ता से व्याकुल।
पुत्र्याः = पुत्री का, की, के।
कोमलतनुम् = कोमल शरीर को।
आदिशत् = आदेश दिया।
वत्से = हे पुत्री !
क्व = कहाँ।
आतपात् = धूप से।
आत्मानम् = स्वयं को, अपने आपको।
रक्षिष्यसि = रक्षा करोगी, बचाओगी।
तर्हि = तो, इसलिए।
तपः मा चर = तपस्या मत करो।
अत्रैव (अत्र + एव) = यहाँ पर ही।
व्रतादिकम् (व्रत + आदिकम् ) = उपवास आदि को ।
एतेनैव (एतेन + एव) = इससे ही।
मनोरथपूर्तिः = मन की इच्छापूर्ण।

सरलार्थ:-नारद के वचन के प्रभाव से पार्वती ने शिव को पति के रूप में चाहते हुए तपस्या करने की इच्छा की। उसने अपने संकल्प को माता से कहा। यह सुनकर पार्वती की माता चिन्ता से व्याकुल हो गई। पुत्री के कोमल शरीर को देखकर माता ने आदेश दिया”बेटी कहाँ तो कठोर तपस्या और कहाँ तुम्हारा कोमल शरीर? धूप से या सर्दी से स्वयं को कैसे बचाओगी ? इसीलिए तपस्या मत करो। सुखपूर्वक अपने घर में ही रहो। यहाँ पर ही उपवास आदि करो। इससे तेरे मन की इच्छा पूर्ण हो जाएगी।”

2. परन्तु पार्वती अकथयत्-“अम्ब ! शिवं पतिरूपेण प्राप्तुं तपस्यामेव करिष्यामि इति मे सङ्कल्पः । ईश्वरः मम रक्षा करिष्यति। तपस्यार्थ कोऽपि न गृहे वसति।” एवमुक्त्वा दृढनिश्चया सा पितृगृहं परित्यज्य कानने निर्मितां स्वपर्णकुटीम् अगच्छत् शिवं च अनन्यमनसा अपूजयत्, चिरं तपस्यां च समाचरत्। कानने हिंस्त्राः पशवः विचरन्ति स्म। तथापि पार्वती निर्भया वसतिस्म। यतो हि निर्भयं जनम् ईश्वरः स्वयमेव रक्षति।

शब्दार्थाः-
अम्ब = हे माँ !
प्राप्तुम् = प्राप्त करने के लिए ।
तपस्यार्थम् = तपस्या के लिए।
कोऽपि (कः + अपि) = कोई भी।
उक्त्वा = कहकर
दृढनिश्चया = दृढ़ निश्चय
वाली। पितृगृहम् = पिता के घर को।
परित्यज्य = छोड़कर।
कानने = वन में, जंगल में।
स्वपर्णकुटीम् = अपने पत्तों की कुटिया में।
अनन्यमनसा = एकाग्र चित्त से।
चिरम् = बहुत समय तक।
समाचरत् = करने लगी, करने लगा।
हिंसाः = हिंसक।
विचरन्ति स्म = घूमा करते थे।
यतोहि = क्योंकि।

सरलार्थ:-परन्तु पार्वती ने कहा-‘हे माँ शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या ही करूँगी, यही | मेरा संकल्प है। ईश्वर मेरी रक्षा करेगा। तपस्या के लिए |कोई भी घर में नहीं रहता।’ यह कहकर दृढ़ निश्चय वाली वह (पार्वती) पिता का घर छोड़कर वन में बनाई गई अपनी | पत्तों की कुटिया में चली गई और शिव की एकाग्र मन से पूजा की, और बहुत समय तक तपस्या की। वन में हिंसक पशु घूमा करते थे तो भी पार्वती निर्भय रहती थी। क्योंकि निर्भय मनुष्य की रक्षा ईश्वर स्वयं करता है।

3. कतिचित् मासा: गताः । एकदा कश्चित् वदुः तपोवनं प्राविशत्। वटुं दृष्ट्वा पार्वती आसनात् उत्थाय तमुपगम्य सादरम् अवदत्-“वटो, स्वागतं ते। उपविशतु भवान्।” वदुः कुशलं पृष्ट्वा कौतूहलेन अपृच्छत्-“हेतपस्विनि ! किमर्थं कठिनं तपः समाचरसि ? स्वकीयां तनुं च मलिनां करोषि ?” पार्वती न किञ्चित् वदति स्म। तत्सखी एव तस्याः सङ्कल्पस्य प्रयोजनं वटवे निवेदयति स्म।
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 8

शब्दार्था:-
कतिचित् = कुछ।
गताः = बीत गए।
वटुः = ब्रह्मचारी।
प्राविशत् (प्र + अविशत्) = प्रवेश किया, आया।
उत्थाय = उठकर।
तमुपगमय (तम + उपगम्य) = उसके पास जाकर
उपविशतु = बैठो, बैठिए।
कौतूहलेन = उत्सुकता से।
पृष्ट्वा = पूछकर।
समाचरसि = करती हो, करते हो।
स्वकीयाम् = अपने।
तनुम् = शरीर को।
वटवे = ब्रह्मचारी को।
निवेदयति स्म = निवेदन किया, कहा।

सरलार्थ:-(पार्वती को तपस्या करते हुए) कुछ महीने – बीत गए। एक बार कोई ब्रह्मचारी तपोवन में आया। ब्रह्मचारी को देखकर पार्वती ने आसन से उठकर उसके पास जाकर आदरपूर्वक कहा-“हे ब्रह्मचारी आपका स्वागत है। आप | बैठिए।” ब्रह्मचारी ने कुशल पूछकर उत्सुकता से पूछा-“हे तपस्या करने वाली ये कठोर तप क्यों कर रही हो ? और अपने शरीर को क्यों मलिन कर रही हो ?” पार्वती ने कुछ नहीं कहा। उसकी सखि ने ही इसके संकल्प के प्रयोजन को ब्रह्मचारी के सामने निवेदन किया।

4. तत् श्रुत्वा वटुः अपृच्छत्-“अयि पार्वति ! किं सत्यमेव त्वं शिवं पतिमिच्छसि यो हि अशिवं चरति, श्मशाने वसति ? यस्य त्रीणि नेत्राणि, यस्य वसनं गजचर्म, यस्य अगरागः चिताभस्म, यस्य परिजनाश्च भूतगणाः, किं तमेव शिवं पतिम् इच्छसि ?”
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 सड.कल्पः सिद्धिदायकः 9

शब्दार्थाः-
अशिवम् = अमगंल।
श्मशाने = श्मशान में।
वसनम् = वस्त्र, कपड़ा।
गजचर्म = हाथी का चमड़ा।
अङ्गरागः = सौन्दर्य सामग्री।
चिताभस्म = चिता की राख।
परिजनाश्च (परिजनाः + च) = सेवक आदि।
भूतगणाः = भूत-प्रेत आदि।

सरलार्थ:-
यह सुनकर ब्रह्मचारी ने पूछा- “हे पार्वती क्या तुम सचमुच ही शिव को पति के रूप में चाहती हो, जो शिव अमंगल आचरण करता है और श्मशान में रहता है जिसके तीन नेत्र हैं, जिसका वस्त्र हाथी का चमड़ा है, जिसकी सौन्दर्य सामग्री चिता की राख है और जिसके सेवक भूत-प्रेत आदि हैं। क्या तुम उसी शिव को पति के रूप में चाहती हो ?”

5. शिवनिन्दां श्रुत्वा पार्वती क्रुद्धा जाता। सा अवदत्”अपसर अरे वाचाल ! त्वं महेश्वरस्य परमार्थस्वरूपमेव न जानासि। जनाः अनादिकालात् सङ्कल्पसिद्धये शिवमेव पूजयन्ति । तत् नोचितं त्वया सह सम्भाषणम्।” एवमुक्त्वा यदा सा प्रस्थानाय उद्यता, तावदेव शिवः वटोः रूपं परित्यज्य तस्याः मार्गम् अवरुध्य अवदत् “पार्वति ! प्रीतोऽस्मि तव सङ्कल्पेन तपस्यया च।”

शब्दार्थाः-
अपसर = दूर हट जाओ।
वाचाल = व्यर्थ ,बोलने वाले।
परमार्थस्वरूपमेव (परम + अर्थस्वरूपम् + एव) = दिव्यरूप को ही/यथार्थस्वरूप को ही।
सड़कल्पसिद्धये = संकल्प को पूरा करने के लिए।
नोचितम् (न + उचितम्) = उचित (ठीक) नहीं है।
प्रस्थानाय = जाने के लिए।
सम्भाषणम् = बात-चीत।
उद्यता = तैयार हुई।
तावदेव ( तावत् + एव) = तभी।
अवरुध्य = रोक कर।
प्रीतोऽस्मि (प्रीतः + अस्मि) = प्रसन्न हूँ।

सरलार्थ:-
शिव की निन्दा सुनकर पार्वती क्रुद्ध हो गई। वह बोली-“हे व्यर्थ बोलने वाले ! दूर हट। तू महेश्वर शिव के दिव्यस्वरूप को नहीं जानता है। लोग अनादिकाल से अपने संकल्प की सिद्धि के लिए शिव को ही पूजते हैं। इसीलिए तेरे साथ बात-चीत करना उचित नहीं है।” यह कहकर जब वह जाने के लिए तैयार हुई, तभी शिव ब्रह्मचारी के रूप को छोड़कर उसका रास्ता रोककर बोले”हे पार्वती ! मैं तेरे संकल्प से तथा तेरी तपस्या से प्रसन्न